Mahavir-Jayanti-2021-theedusarthi
Lord Mahavir Swami : जानिए जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के बारे में
April 25, 2021
Zydus-cadila-virafin-theedusarthi
Corona Vaccine : कोरोना के इलाज के लिए जायडस केडिला की Virafin दवा को DGCI की मंजूरी
April 26, 2021

कुलकरों की परम्परा के बाद जैन धर्म (Jain Dharma) में क्रमश, 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलभद्र, 9 वासुदेव और नौ प्रति वासुदेव मिलाकर कुल 63 महान पुरुष हुए हैं। इन 63 शलाका पुरुषों का जैन धर्म और दर्शन को विकसित और व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जैन धर्म में कैवल्य के 3 मार्ग/त्रिरत्न बताएं गए है- सम्यक्‌दर्शन, सम्यक्‌ ज्ञान और सम्यक्‌ चारित्र।

जैन परम्परा में 24 तीर्थंकर हुए हैं जिनके नाम इस प्रकार है-. ऋषभ, अजित, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंद्रप्रभ, पुष्पदंत, शीतल, श्रेयांश, वासुपूज्य, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुन्थु, अरह, मल्लि, मुनिव्रत, नमि, नेमि, पार्श्वनाथ और महावीर। जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों के बारे में नीचे विस्तार से दिया जा रहा है।

जैन शब्द का अर्थ (Meaning of Jain Word)

जैन शब्द जिन शब्द से बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है जिसने स्वयं को जीत लिया उसे जितेंद्रिय भी कहा जाता है।

तीर्थंकर का अर्थ (Meaning of Thirankar)

तीर्थंकर का अर्थ है. जो तारे, तारने वाला। तीर्थंकर को अरिहंत भी कहा जाता है। अरिहंत का अर्थ होता है जिसने अपने भीतर के शत्रुओं पर विजय पा ली। ऐसा व्यक्ति जिसने कैवल्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया। अरिहंत का अर्थ भगवान भी होता है।

ऋषभदेव (Risabhdev)

कुलकरों की कुल परंपरा के सातवें कुलकर नाभिराज और उनकी पत्नी मरुदेवी से ऋषभदेव का जन्म चैत्र कृष्ण की अष्टमी नवमी को अयोध्या में हुआ था। इनके दो पुत्र भरत और बाहुबली तथा दो पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी थीं। इन्होंने चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को दीक्षा ग्रहण की तथा फाल्गुन कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई। कैलाश पर्वत क्षेत्र के अष्टपद में माघ कृष्ण 14 को निर्वाण प्राप्त हुआ। इनका प्रतीक चिह्न बैल हैं।

अजीतनाथ (Ajitnath)

दूसरे तीर्थंकर अजीतनाथ हुए जिनकी माता का नाम विजया और पिता का नाम जितशत्रु था। इनका जन्म माघ शुक्ल पक्ष की दशमी को अयोध्या में हुआ था। माघ शुक्ल पक्ष की नवमी को इन्होंने दीक्षा ग्रहण की तथा पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी को आपको कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। चैत्र शुक्ल की पंचमी को इन्हें सम्मेद शिखर पर निर्वाण (Nirvana) प्राप्त हुआ। इनका प्रतीक चिह्न गज है।

संभवनाथ (sambhavnath)

तीसरें तीर्थंकर संभवनाथ हुए जिनकी माता का नाम सुसेना और पिता का नाम जितारी है। चैत्र शुक्ल पक्ष की पंचमी को सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार उनका प्रतीक चिह्न अश्व है।

अभिनंदन (Abhinandan)

चौथे तीर्थंकर अभिनंदन हुए जिनकी माता का नाम सिद्धार्था देवी और पिता का नाम संवरा राज था। इनका जन्म अयोध्या में हुआ। सम्मेद शिखर पर इनको निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार उनका प्रतीक चिह्न बंदर है।

सुमतिनाथ (Sumatinath)

पांचवें तीर्थंकर सुमतिनाथ हुए जिनकी माता सुमंगला एवं पिता का नाम मेघरथ था। बैशाख शुक्ल की अष्टमी को साकेतपुरी ;अयोध्या में इनका जन्म हुआ। सम्मेद शिखर पर इन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न चकवा है।

पद्ममप्रभु (Padmprabhu)

छठवें तीर्थंकर पद्मप्रभु हुए जिनकी माता का नाम सुसीमा देवी एवं पिता का नाम धरण राज था। इनको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न कमल है।

सुपार्श्वनाथ (Suparswanath)

सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ हुए जिनकी माता का नाम पृथ्वीदेवी एवं पिता का नाम प्रतिस्थसेन था। इनका जन्म वाराणसी में हुआ था।  इनको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न स्वस्तिक है।

चन्द्रप्रभु (Chandraprabhu)

आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभु के पिता का नाम राजा महासेन तथा माता का नाम सुलक्षणा था। इनको सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार आपका प्रतीक चिह्न अर्द्धचन्द्र है।

पुष्पदंत (Puspdant)

नौवें तीर्थंकर पुष्पदंत हुए जिन्हें सुविधिनाथ भी कहा जाता है। इनके माता-पिता इक्ष्वाकु वंश के राजा सुग्रीव राज एवं रमा रानी थे। सम्मेद शिखर इन्हें ज्ञान  और निर्वाण प्राप्त हुआ। इनका प्रतीक चिह्न मकर है।

शीतलनाथ (Shitalnath)

दसवें तीर्थंकर शीतलनाथ हुए जिनके माता-पिता सुनंदा एवे दृढ़रथ थे। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। इनका प्रतीक चिह्न  कल्पतरु है।

श्रेयांसनाथ (Shreyansnath)

ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ हुए जिनकी माता का विष्णुश्री या वेणुश्री एवं पिता विष्णुराज थे। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न गैंडा है।

वासुपूज्य Vasupujya)

बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य प्रभु हुए जिनके पिता वसुपूज्य और माता जया देवी थी। चंपा में इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न भैंसा है।

विमलनाथ (Vimalnath)

तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ हुए जिनके पिता कृतर्वेम एवं माता श्याम देवी थी। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न शूकर है।

अनंतनाथ (Anantnath)

चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ हुए जिनकी माता का नाम सर्वयशा तथा पिता का नाम सिंहसेन था। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न सेही है।

धर्मनाथ (Dharmanath)

पन्द्रहवें तीर्थंकर धर्मनाथ हुए जिनके पिता का नाम भानु और माता का नाम सुव्रत था। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। इनका प्रतीक चिह्न वज्र है।

शांतिनाथ (Shantinath)

जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर शांतिनाथ हुए। शांतिनाथ के पिता हस्तिनापुर के राजा विश्वसेन माता आर्या थी। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। इनका प्रतीक चिह्न हिरण हैं।

कुंथुनाथ (Kunthunath)

सत्रहवें तीर्थंकर कुंथुनाथ हुए जिनकी माता का नाम श्रीकांता देवी और पिता का नाम राजा सूर्यसेन था। सम्मेद शिखर पर इन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। इनका प्रतीक चिह्न छाग है।

अरहनाथ (Arahnath)

अठारहवें तीर्थंकर अरहनाथजी या अर प्रभु हुए जिनके पिता का नाम सुदर्शन और माता का नाम मित्रसेन देवी था। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार उनका प्रतीक चिह्न तगरकुसुम है।

मल्लिनाथ (Mallinath)

उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ हुए जिनके पिता का नाम कुंभराज और माता का नाम प्रभावती था। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार प्रतीक चिह्न कलश है।

मुनिसुव्रतनाथ (Munnisruvatnath)

बीसवें तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ हुए जिनके पिता का नाम सुमित्र तथा माता का नाम प्रभावती था। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार प्रतीक चिह्न कूर्म है।

नमिनाथ (Naminath)

इक्कीसवें तीर्थंकर नमिनाथ हुए जिनके पिता का नाम विजय और माता का नाम सुभद्रा था। इन्हें सम्मेद शिखर पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न उत्पल है।

नेमिनाथ (Neminath)

बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ हुए जिनके पिता का नाम राजा समुद्रविजय और माता का नाम शिवादेवी था। इन्हें उज्जैन या गिरनार पर्वत पर निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न शंख है।

पार्श्वनाथ (Parswanath)

तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ हुए जिनके पिता का नाम राजा अश्वसेन तथा माता का नाम वामा था। सम्मेद शिखर पर इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न सर्प है।

महावीर (Mahavir)

चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हुए जिनकी माता त्रिशला एवं पिता सिद्धार्थ थे। इनका जन्म चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी के दिन कुंडलपुर में हुआ था। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की दशमी को इन्होंने दीक्षा ग्रहण की तथा वैशाख शुक्ल की दशमी के दिन कैवल्य की प्राप्ति हुई। 42 वर्ष तक इन्होंने साधक जीवन बिताया। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन इनको पावापुरी में 72 वर्ष की अवस्था में निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्मावलंबियों के अनुसार इनका प्रतीक चिह्न सिंह है।

ये भी पढ़ें- MAHATMA GANDHI: महात्मा गांधी का संपूर्ण जीवन परिचय

ये भी पढ़ें- STATIC GK : स्टेटिक जीके सीरिज 05

ये भी पढ़ें- BJP Foundation Day 2021 : भाजपा स्थापना दिवस, भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा हर एक अपडेट

ये भी पढ़ें- Income Tax : जानें क्या है विवाद से विश्वास योजना?

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *