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Police commemoration day 2020: जब भारतीय पुलिस के समाने चीन के उड़ गए थे होश

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भारत में पुलिस, सरकार की एक ऐसी एजेंसी/संगठन है, जो जनता की किसी भी जरूरत पर सहायतार्थ सबसे पहले पहुँचती है। फिर चाहे वे आतंकवादी या घुसपैठी हमले हों, साधारण जुर्म, कानून व्‍यवस्‍था, प्राकृतिक या मानवनिर्मित आपदा या आपातकालीन मानवीय सहायता ही क्‍यों न हो, पुलिस सदैव सबसे आगे रहती है। नागरिकों को सार्थक, स्‍वच्‍छन्‍द व निर्भीक जीवन व्‍यतीत करने हेतु शान्तिपूर्ण वातावरण की स्‍थापना करने में पुलिस का अमूल्य योगदान है। हमारे पुलिसकर्मियों के शौर्य और बलिदान का इतिहास देश की वीरता प्रतिनिधित्व करता है। सुरक्षा सरकार का प्रथम मौलिक कर्तव्‍य है, जिसकी लिए पुलिस एक कवच के रूप में कार्य करती है।

ऐसे हुई स्मृति दिवस मनाने की शुरुआत

जनवरी 1960 में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिरीक्षकों का वार्षिक सम्मेलन हुआ था। इसी सम्मेलन में लद्दाख में शहीद हुए उन वीर पुलिसकर्मियों और वर्ष भर के दौरान ड्यूटी पर सर्वोच्च बलिदान देने वाले अन्य पुलिसकर्मियों को सम्मानित करने का फैसला लिया गया।

चुनौतियों का सामना करते समय कितनी ही बार पुलिस अधिकारियों एवं जवानों को अपनी शहादत देनी पड़ती है और अपने निजी पारिवारिक दायित्‍वों की उपेक्षा भी करनी पड़ती है। बीते समय में औसतन लगभग 700 पुलिसकर्मी प्रतिवर्ष कर्तव्‍य पालन करते हुए शहीद हुए हैं। आज़ादी के बाद से अब तक लगभग 33,000 से भी ज्‍यादा पुलिसकर्मियों ने कर्तव्‍य की वेदी/वर्दी की मान रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, जो अन्‍य किसी भी सरकारी विभाग या संस्‍था से कहीं ज्‍यादा है।

21 अक्टूबर की बात

अपने कर्तव्य‍ पालन में सर्वोच्च बलिदान देने वाले इन जाबांज पुलिसकर्मियों की शाश्वत याद में पूरे देश में 21 अक्तूबर, ‘स्मृति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। भारतीय क्षेत्र में चीन के सैन्य कर्मियों द्वारा 21 अक्टूबर, 1959 में लद्दाख स्थित हॉटस्प्रिंग में घात लगाकर किए गए हमले में हमारे 10 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। अत: 21 अक्टूबर हमारे लिए अति महत्वपूर्ण दिन है। वर्ष 1962 में आयोजित डीजीपी/आईजीपी सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष 21 अक्तूबर को इन बहादुर पुलिस कर्मियों की याद में ‘पुलिस स्मृति दिवस’ मनाया जाएगा।

ये बात साल21 अक्टूबर, 1959 में जब 10 पुलिसकर्मियों ने अपना बलिदान दिया था। तब तिब्बत के साथ भारत की 2,500 मील लंबी सीमा की निगरानी की जिम्मेदारी भारत के पुलिसकर्मियों की थी। इस घटना से एक दिन पहले 20 अक्टूबर, 1959 को तीसरी बटालियन की एक कंपनी को उत्तर पूर्वी लद्दाख में हॉट स्प्रिंग्स नाम के स्थान पर तैनात किया गया था। लाइन ऑफ कंट्रोल में ये जवान गश्त के लिए निकले। आगे गई दो टुकड़ी के सदस्य उस दिन दोपहर बाद तक लौट आए। लेकिन तीसरी टुकड़ी के सदस्य नहीं लौटे। उसी टुकड़ी में दो पुलिस कॉन्स्टेबल और एक पोर्टर शामिल थे। अगले दिन फिर सभी जवानों को इकट्ठा किया गया और गुमशुदा लोगों की तलाश के लिए एक टुकड़ी का गठन किया गया।

इनकी शहादत से स्मृति दिवस की हुई शुरूआत

गुमशुदा हो गए पुलिसकर्मियों की तलाश में तत्कालीन डीसीआईओ करम सिंह के नतृत्व में एक टुकड़ी 21 अक्टूबर 2018 को प्रस्थान की। इस दल में लगभग 20 पुलिसकर्मी शामिल थे। करम सिंह घोड़े पर सवार थे जबकि बाकी पुलिसकर्मी पैदल थे। पैदल सैनिकों को 3 टुकड़ियों में बांटा गया था। दोपहर के समय चीन के सैनिकों ने एक पहाड़ी से गोलियां और ग्रेनेड्स फेंकना शुरू कर दिया। जिसमें ज्यादातर वीर सैनिक घायल हो गए। उस हमले में देश 10 वीर पुलिसकर्मी शहीद हो गए जबकि सात अन्य बुरी तरह घायल हो गए। इन 7 घायल पुलिसकर्मियों को चीनी सैनिक बंदी बनाकर ले गए जबकि बाकी अन्य पुलिसकर्मी वहां से निकलने में कामयाब रहे। 13 नवंबर, 1959 को शहीद हुए दस पुलिसकर्मियों का शव चीनी सैनिकों ने लौटा दिया। उन पुलिसकर्मियों का अंतिम संस्कार हॉट स्प्रिंग्स में पूरे पुलिस सम्मान के साथ हुआ। उन्हीं शहीदों के सम्मान में हर साल 21 अक्टूबर को नैशनल पुलिस डे या पुलिस स्मृति दिवस मनाया जाता है।

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