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Jaiprakash Narayan: लोकतंत्र के नायक जयप्रकाश नारायण विशेष

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अंग्रेजो से भारत की आजादी का जिक्र होने पर जिस तरह सबसे पहले महात्मा गांधी का जिक्र आता है, ठीक उसी तरह देश की दूसरी आजादी का सबसे बड़ा श्रेय लोकनायक जयप्रकाश नारायण को जाता है। दूसरी आजादी यानी देश में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से थोपे गए आपातकाल का खात्मा और लोकतंत्र की स्थापना। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को नया जीवन देने वाले जयप्रकाश नारायण का जन्म आज ही के दिन 11 अक्टूबर 1902 में हुआ था।

व्यक्तिगत परिचय

जयप्रकाश नारायण का जन्म बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमा पर मौजूद छोटे से गांव सिताब दियारा में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव में हासिल करने के बाद सातवीं क्लास में उनका दाखिला पटना में कराया गया है। बचपन से ही मेधावी जयप्रकाश को मैट्रिक की परीक्षा के बाद पटना कॉलेज के लिए स्कॉलरशिप मिली। खबरों के अनुसार वे पढ़ाई के दौरान ही गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे और स्वदेशी सामानों का इस्तेमाल करते थे। वह हाथ से सिला कुर्ता और धोती पहनते थे। जेपी ने पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजों के खिलाफ जंग भी छेड़ दी थी। अंग्रेज सरकार की ओर से वित्तपोषित होने की वजह से जेपी ने कॉलेज को बीच में ही छोड़ दिया और बिहार कांग्रेस की ओर से चलें गए बिहार विद्यापीठ से पढ़ाई जारी रखीं।

ब्रह्मचर्य व्रत

महज 18 साल की उम्र में 1920 में जेपी का विवाह ब्रज किशोर प्रसाद की बेटी प्रभावती से हुआ। कुछ साल बाद ही प्रभावती ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और अहमदाबाद में गांधी आश्रम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा के साथ रहने लगीं। जेपी ने भी पत्नी के साथ ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया।

आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभा रहे जेपी को 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में उन्हें काफी यातनाएं दी गईं। जेल से बाहर आने के बाद वह भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए। इसी दौरान कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ और जेपी इसके महासचिव बनाए गए।

1954 में उन्होंने बिहार में बिनोवा भावे के सर्वोदल आंदोलन के लिए काम करने की घोषणा की थी। 1957 में उन्होंने राजनीति छोड़ने का भी फैसला कर लिया था। हालांकि, 1960 के दशक के अंत में एक बार फिर वे राजनीति में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने किसानों के आंदोलनों की भी अगुआई की।

क्यों हुआ जेपी आंदोलन

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा चुनाव में अयोग्य ठहराए जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी। विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को जेल में ठूस दिया गया और अभिव्यक्ति की आजादी पर भी पहरा लगा दिया गया। जयप्रकाश नारायण ने उस समय देश को एकजुट किया और उनके जनआंदोलन का ही परिणाम था कि करीब 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को आपताकाल खत्म हो गया। इन्हें लोकनायक के नाम से जाना जाता है।

जयप्रकाश नारायण प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ थे। 1974 में आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से अंजाम देने की शर्त पर उन्होंने इसकी अगुआई जेपी द्वारा की गई। इसी दौरान देश में सरकार विरोधी माहौल बना तो इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी। जेपी भी जेल गए और करीब सात महीनों तक जेल में रहे। उनकी तबीयत भी उन दिनों खराब थी, लेकिन जो संप्रूण क्रांति का नारा दिया, उसने देश में लोकतंत्र की बहाली दोबारा सुनिश्चित कर दी।

जेपी आंदोलन का असर

आपातकाल के बाद देश में चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी की करारी हार हुई और केंद्र में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। खुद इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी चुनाव हार गए थे। जेपी आंदोलन में छात्र नेता में शामिल हुए कई नेता जैसे लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद सुशील मोदी जैसे दर्जनों नेता बाद में वर्षों तक सत्ता में रहे। आपातकाल की लड़ाई में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया था।

8 अक्टूबर 1979 को डायबिटीज और दिल की बीमारी के कारण पटना में जेपी का निधन हो गया। 1999 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था।

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