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NARCO TEST: नार्को टेस्ट से आखिर क्यों डरते है अपराधी, जानें विस्तार से

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नार्को टेस्ट झूठ एवं सच का पता लगाने की तकनीक है। इस टेस्ट के जरिए जांच एजेंसिया अपराधियों का पुख्ता सबूत कइठ्ठा करती है। यह टेस्ट अक्सर हाइप्रोफाइल मामलों में ही कराई जाती है।

यह तकनीक ऐसे करता है काम

नार्को टेस्ट झूठ पकड़ने की एक तकनीक है। इस टेस्ट में संबंधित व्यक्ति से पूछताछ की जाती है और जब वह जवाब देता है, उस वक्त एक विशेष मशीन की स्क्रीन पर कई ग्राफ बनते हैं। व्यक्ति की सांस, हृदय गति और ब्लड प्रेशर में बदलाव के हिसाब से ग्राफ ऊपर-नीचे होता है।
व्यक्ति के झूठ/सच बोलने का जवाब इसी ग्राफ में होता है जिसे इससे जुड़े तकनीशियन ही समझ सकते है। यदि ग्राफ में अचानक असामान्य बदलाव होने लगे तो इसका मतलब है कि व्यक्ति झूठ बोल रहा है।

दवा/इंजेक्शन के द्वारा टेस्ट

इस टेस्ट में व्यक्ति को कुछ दवाइयां या इंजेक्शन दी जाती हैं। आम तौर पर ट्रूथ ड्रग नाम की एक साइकोऐक्टिव दवा दी जाती है या फिर सोडियम पेंटोथोल का इंजेक्शन लगाया जाता है। इस दवा के असर से व्यक्ति न तो पूरी तरह होश में होता है और न ही पूरी तरह बेहोश होता है। इस स्थिति में वह सवालों का सही-सही जवाब देता है क्योंकि वह अर्धबेहोशी की वजह से झूठ गढ़ पाने में नाकाम होता है।

टेस्ट में ऐसे प्रश्न पूछे जाते है

इस टेस्ट को करते वक्त शुरुआत में बहुत ही सामान्य से प्रश्न पूछे जाते हैं, जैसे- नाम, पिता का नाम, उम्र, पता और परिवार से जुड़ी जानकारियां, पेड़, पौधे, फूल और फल इत्यादि दिखाए जाते हैं इसके तुरंत बाद उसे उस केस से जुड़ी तस्वीर दिखाई जाती है फिर अचानक संबंधित अपराध के बारे में सवाल किया जाता है या उससे संबंधित तस्वरी दिखाई जाती है।

नार्को टेस्ट पर नियम

वर्ष 2010 में के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने कहा था कि जिस व्यक्ति का नार्को टेस्ट या पॉलीग्राफ टेस्ट लिया जाना है उसकी सहमती भी आवश्यक है। इस टेस्ट को कराने के लिए कोर्ट सहमति आवश्यक है।

गलत भी हो सकते हैं नतीजे

यह टेस्ट कई मुश्किल मामलों में पुलिस/सीबीआई/जांच एजेंसी को सबूत अवश्य दे देता है। लेकिन पॉलिग्राफ/नार्को/ब्रेन मैपिंग टेस्ट के नतीजे शत-प्रतिशत सही ही आएं ऐसा नहीं होता है। कुछ हार्डकोर क्रिमिनल इन टेस्ट को भी चकमा देने में कामयाब हो जाते हैं।

नोट

*जिसका पॉलिग्राफ, नार्को या ब्रेन मैपिंग टेस्ट होना है, उसकी सहमति जरूरी है।

*इसे पॉलिग्राफ/लाइ-डिटेक्टर/नार्को टेस्ट कहा जाता है।
*पॉलिग्राफ, नार्को और ब्रैन मैपिंग टेस्ट दरअसल झूठ को पकड़ने की तकनीक होती हैं।

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