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साहस और शौर्य के प्रतीक कैप्टन विक्रम बत्रा की 46 वीं जयंती आज, जानें विक्रम बत्रा के बारे में

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एक  ऐसा हीरो  जिसके साहस एवं शौर्य के आगे दुश्मन सैनिकों के छक्के छूट गए थे, अंतिम सांस तक भारत माता के लिए लड़ने वाले उस असली नायक का नाम है कैप्टन विक्रम बत्रा। कारगिल की लड़ाई में कैप्टन विक्रम बत्रा की बहादुरी और देश के लिए उनके बलिदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत भारतीय सेना के सर्वोच्च सम्मान परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में 9  सितंबर 1974 को जन्मे कैप्टन विक्रम बत्रा ने 1996 में भारतीय सेना की संयुक्त रक्षा परीक्षा पास की और सेना में कमिशन लेकर लेफ्टिनेंट बने। कैप्टन विक्रम बत्रा ने कारगिल की लड़ाई में जिस साहस और बहादुरी से दुश्मन का खात्मा किया था उसकी आज भी मिसाल दी जाती है।

वीरता:

‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान 20 जून 1999 को डेल्टा कंपनी कमांडर कैप्टन विक्रम बत्रा को प्वाइंट 5140 पर आक्रमण करने का दायित्व सौंपा गया। कैप्टन विक्रम बत्रा अपनी कंपनी के साथ घूमकर पूर्व दिशा से इस क्षेत्र की तरफ बढ़े और बिना शत्रु को भनक लगे हुए उसकी मारक दूरी के भीतर तक पहुंच गए। कैप्टन ने अपने दस्ते को पुनर्गठित किया और दुश्मन के ठिकानों पर सीधे आक्रमण के लिए प्रेरित किया। सबसे आगे रहकर टीम का नेतृत्व करते हुए कैप्टन विक्रम बत्रा ने निडरता से शत्रु पर धावा बोला और आमने सामने की लड़ाई में 5 शत्रु सैनिकों को मार गिराया।

शहादत सम्मान स्थल:

मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले कैप्टन बत्रा की याद में पालनपुर में उनके नाम की एक ‘शहीद शिला’ बनाई गई है, जिससे लोग वहां जाकर जान सकें कि किस तरह से उनके जीवन की रक्षा के लिए देश के वीर सपूतों ने अपने प्राण न्योछावर किए।

यादगार :

कैप्टन बत्रा ने जब रेडियो पर कहा- ‘यह दिल मांगे मोर’ तो पूरे देश में उनका नाम छा गया। इसके बाद 4875 पॉइंट पर कब्जे का मिशन शुरू हुआ। तब आमने-सामने की लड़ाई में पांच दुश्मन सैनिकों को मार गिया। गंभीर जख्मी होने के बाद भी उन्होंने शत्रु की ओर ग्रेनेड फेंके। खुद जीवित नहीं रहे, लेकिन भारतीय सेना को मुश्किल जीत दिलाई। कैप्टन बत्रा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सेना कारगिल पर फतह करने में सफल हुई  भारत की इस जीत में कैप्टन विक्रम बत्रा का अहम योगदान रहा  कारगिल की चोटी पर लिए अपने साहसिक कदम के वजह से उन्हें “शेरशाह” का नाम दिया गया था

नोट: 
*कारगिल युद्ध के समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे।

*भारतीय सेना के सेना प्रमुख वी.पी. मलिक थे।
*भारतीय वायु सेना के चीफ एवाई टिपनिस थे।

*कारगिल में ऑपरेशन विजय में योगदान देने वाला हर सैनिक भारत का हीरो है।
*पाकिस्तानी सेना का प्रमुख जनरल परवेज मुशरर्फ था।
*14 जुलाई को कारगिल विजय की घोषणा भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की।
*प्रतिवर्ष 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है।
*“ये दिल मांगे मोर” कथन भारत के सपूत कैप्टन विक्रम ​बत्रा का है।

*भारत-पाकिस्तान की कारगिल लड़ाई के दौरान पॉइंट 4875 पर कब्जे के दौरान वे शहीद हुए।

*का​रगिल युद्ध केे समय कैप्टन बत्रा 12वीं जम्मू—कश्मीर राइफल्स में तैनात थे।

*महज 24 साल की उम्र में 7 जुलाई 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा ने देश के लिए अपनी जान दी।

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