theedusarthi_teachers_day
5 सितंबर: शिक्षक दिवस से जुड़ी हर एक जानकारी
September 5, 2020
theedusarthi-current-affairs-quiz
5-6 सितंबर 2020 करेंट अफेयर्स क्विज
September 6, 2020
Show all

शिक्षक दिवस विशेष: पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन परिचय

theedusarthi_sarvpalli_radhakrishnan

भारत के पहले उपराष्ट्रपति एवं दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन परिचय अथाह जानकारियों से भरा हुआ है। डॉ. राधाकृष्णन के बारे में एवं जीवन से सीखने योग्य तथ्यों एवं विचारों को समाहित किया गया है। भारत में हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है, जो इस महापुरुष का जन्मदिवस भी है।

जन्मस्थान:

डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के चित्तूर जिले के तिरूत्तनी गांव के एक तेलगुभाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह चेन्नई से लगभग 64 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है और 1960 तक आंध्र प्रदेश में था और वर्तमान में तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में पड़ता है।

डॉ॰ राधाकृष्णन एक निर्धन किन्तु विद्वान ब्राह्मण की सन्तान थे। उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरासमियाह और माता का नाम सीताम्मा था। उनके पिता राजस्व विभाग में  थे। राधाकृष्णन 6 भाई—बहन थे जिसमें 5 भाई और 1 बहन थी। राधाकृष्णन दूसरे बड़े बेटे थे।

वैवाहिक जीवन:
उस समय मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही विवाह हो जाता था। 1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह सिवाकामू के साथ हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी।  वर्ष 1908 में इन्हें एक पुत्री रूप में एक संतान की प्राप्ति हुई।

शिक्षा:
राधाकृष्णन का बाल्यकाल  तिरूतनी में बीता।     उन्होंने 1902 में मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने 1904 में कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली। इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी। उन्होंने स्वामी विवेकानन्द और अन्य महान विचारकों का अध्ययन किया।  दर्शनशास्त्र में एम०ए० करने के पश्चात् 1918 में वे मैसुर महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। बाद में उसी कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ॰ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया। सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गयी।

हिन्दू शास्त्रों का अध्ययन:
शिक्षा का प्रभाव जहाँ प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है, वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है। क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों के भीतर काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था। यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में क्रिश्चियन परंपराए आ गई। लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था। कुछ लोग हिन्दुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे। उनकी आलोचना को डॉ॰ राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन करना आरम्भ कर दिया। इन्हें ज्ञात हुआ कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे। इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं। इससे इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा सन्देश देती है।

धर्म संस्कृति के समर्थक:
डा. सर्वपल्ली राधाकृषणन  ऐसे एक मात्र महापुरुष है, जो धर्म संस्कृति से काफी लगाव करने के साथ-साथ संपूर्ण विश्व को एक विद्यालय की संज्ञा देते थे। इसलिए उन्होंने हमेशा अपनी पुस्तकों व लेखों के माध्यम से संपूर्ण जनमानस को, विश्व परिधि से परिचित कराने का प्रयास किया। उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकें जैसे:- भारतीय दर्शन व धर्म, गौतमबुद्धा जीवन और दर्शन,भारत और विश्व है।

 

दर्शन:
डॉ॰ राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- “मानव को एक होना चाहिए”। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो। डॉ॰ राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से परिपूर्ण व्याख्याओं,  अभिव्यक्तियों और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मन्त्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को भी देते थे। वह जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गम्भीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे।  1912 में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की “मनोविज्ञान के आवश्यक तत्व” शीर्षक से एक लघु पुस्तिका भी प्रकाशित हुई जो कक्षा में दिये गये उनके व्याख्यानों का संग्रह था।

राजनीतिक सफर: 

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन 1928  में इनकी पहली बार मुलाक़ात पण्डित जवाहर लाल नेहरू से उस समय हुई, जब वह कांग्रेस पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में सम्मिलित होने के लिये कलकत्ता आए हुए थे। सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये।

आज़ादी के बाद संयुक्त राष्ट्र में  विजयलक्ष्मी पंडित का इन्हें नया उत्तराधिकारी चुना गया। सर्वपल्ली राधाकृष्णन  मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वे सबसे बेहतर थे। वे एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे। जो मन्त्रणाएँ देर रात्रि होती थीं, वे उनमें रात्रि 10 बजे तक ही भाग लेते थे।

शिक्षक और शिक्षा के प्रति विचार:

*भगवान हम सबके भीतर रहता है, महसूस करता है और कष्ट सहता है, और समय के साथ उसके गुण, ज्ञान, सौन्दर्य और प्रेम हममें से हर एक के अन्दर उजागर होंगे।-सर्वपल्ली राधा कृष्णन
*पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं।-सर्वपल्ली राधा कृष्णन
*जीने के लिए अपने पिता का ऋणी हूं, पर अच्छे से जीने के लिए अपने गुरु का।- अलेक्जेंडर द ग्रेट
*एक गुरु जो अपने शिष्यों को सीखने के लिए प्रेरित किए बिना ही सिखाता है, वह ठंडे लोहे पर चोट करने के समान है।- होरेस मेन

*डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है।
*राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद और महान दार्शनिक थे।

*उन्होंने 1967 तक कार्यालय संभाला। *उन्‍हें भारत रत्‍न, ऑर्डर ऑफ मेरिट, नाइट बैचलर और टेम्‍पलटन प्राइज से नवाजा गया था।

डॉ. राधाकृष्णन के विचार: 

*शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें।

*हमें तकनीकी ज्ञान के अलावा आत्मा की महानता को प्राप्त करना भी जरूरी है।

*पुस्तकें वह माध्यम हैं, जिनके जरिये विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण किया जा सकता है।

*ज्ञान के माध्यम से हमें शक्ति मिलती है. प्रेम के जरिये हमें परिपूर्णता मिलती है।

*भगवान की पूजा नहीं होती बल्कि उन लोगों की पूजा होती है जो उनके नाम पर बोलने का दावा करते हैं।

*कोई भी आजादी तब तक सच्ची नहीं होती,जब तक उसे विचार की आजादी प्राप्त न हो।

*किसी भी धार्मिक विश्वास या राजनीतिक सिद्धांत को सत्य की खोज में बाधा नहीं देनी चाहिए।

*शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है.। अत:विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए।

*शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके।

*किताबें पढ़ने से हमें एकांत में विचार करने की आदत और सच्ची खुशी मिलती है।

*शांति राजनीतिक या आर्थिक बदलाव से नहीं आ सकती बल्कि मानवीय स्वभाव में बदलाव से आ सकती है।

नोट:

*वर्ष 1931 से 36 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे।
*ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में वर्ष 1936 से 1952 तक प्राध्यापक रहे।
*कलकत्ता विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में 1937 से 1941 तक कार्य किया।
*वर्ष 1939 से 48 तक काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।
*वर्ष 1953 से 1962 तक दिल्ली विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।
*उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन अध्यक्ष होते है।
*वर्ष 1946 में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

*वह 1952 में भारत के उपराष्ट्रपति बने और 1962 में भारत के राष्ट्रपति चुने गए।

*वर्ष 1954 में इन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

 

Comments are closed.