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हिन्दुस्तान के जन—जन के प्रिय “भगवान श्रीराम” के भव्य मंदिर का 5 अगस्त को भूमि पूजन होगा। इसके बाद इस भव्य मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया जाएगा। नागर शैली मंदिर स्थापत्य कला की शैली है। इस आर्टिकल में नागर शैली और इससे जुड़ें तथ्यों को बारीकी से जानेंगे।

नागर शैली मंदिर निर्माण करने की पद्धति है जो खासकर “उत्तर भारत” में प्रचलित है। हिन्दु स्थापत्य कला की मंदिर निर्माण की तीन शैलियों में से एक है। इस शैली में निर्मित मंदिर हिमालय पर्वतमाला से लेकर विंध्य पर्वतमाला तक देखे जा सकते है। वास्तुशास्त्र के अनुसार नागर शैली में निर्मित मंदिर की पहचान आधार से लेकर ऊपरी अंश तक इसका चतुष्कोणीय होना है। नागर शैली में बनाएं गए मंदिर में गर्भगृह, मण्डप, अर्द्धमंडप इत्यादि होते है। एक ही अक्ष पर एक दुसरे से जोड़कर इसको बनाया जाता है।
छठी शताब्दी तक तक उत्तर और दक्षिण भारत में मंदिर निर्माण करने की शैली लगभग एकसमान थी, लेकिन छठी शताब्दी के बाद हिन्दू धर्म के मंदिर नागर, बेसर और द्रविण शैली में बनाएं जाने लगें।

नागर शैली की परिभाषा
“नागर” शब्द नगर से उत्पन हुआ है। इस शैली में मंदिरों का निर्माण सबसे पहले नगर में होने के कारण इसे “नागर शैली” कहा जाने लगा।  इस शैली में बने मंदिरों को ओडिशा में कलिंग गुजरात में लाट और हिमालयी क्षेत्र में पर्वतीय कहा जाता है।
इस शैली में निर्मित मंदिरों की ऊचाई को 8 भागों में बांटा जाता है—मूल, गर्भगृह, दीवार, कार्निस, शिखर, गर्दन, वार्तुलाकार आमलक और कुंभ
इस शैली में मंदिरों को सामान्यत: भूमि से ऊपर बनाएं गए मंच, जिसे जगत/वेदी/वेदिका कहा जाता है पर ​बनाया जाता है। इसके द्वार मंडपों के निर्माण में स्तंभो का प्रयोग किया जाता है।
मंदिर परिसर को चहारदिवारी से नहीं घेरा जाता है और न ही इनमें प्रवेश द्वार होता है।
इस शैली में निर्मित मुख्य मंदिर
सोमनाथ मंदिर                      गुजरात
कंदरिया महादे मंदिर             खजुराहो मध्य प्रदेश
लिंगराज मंदिर                      भुवनेशवर उड़ीसा
जगन्नाथ मंदिर                    पुरी उड़ीसा
सूर्य मंदिर                             कोणार्क उड़ीसा

दिलवाड़ा मंदिर                     माउंट आबू राजस्थान
मुक्तेश्वर मंदिर                    उड़ीसा

द्रविण शैली
द्रविड़ शैली दक्षिण भारत में हिन्दू मंदिर स्थापत्य कला की शैली है। दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण इसे द्रविड़ शैली कहा जाता है। कृष्णा नदी से कन्याकुमारी (तमिलनाडु के आस—पास का क्षेत्र) तक द्रविण शैली के मंदिर पाएं जाते है। इस शैली के मंदिर बहुमंजिला होती है। तंजौर का वृहदेश्वर मंदिर द्रविण शैली का उदाहरण है।
बेसर शैली
नागर और द्रविण शैली के मिले—जुले रूप को बेसर शैली कहा जाता है। इस शैली के मंदिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा नदी तक पाएं जाते है। इसे चालुक्य शैली भी कहा जाता है। इसके मंदिरों का आकार गोलाकार या अर्द्धगोलाकार होता है। वृंदावन का वैष्णव मंदिर इस शैली का उदाहरण है।

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