क्या आप जानते हैं राजीव गांधी फाउंडेशन के बारे में?
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बिहार रेजिमेंट की अलग ही खासियत है। बात चाहे सर्जिकल स्ट्राइक में हिस्सा लेने की हो या फिर कारगिल युद्ध में विजय कहानी लिखने की, इस रेजिमेंट ने हर जगह अपने अदम्य साहस का परिचय दिया और प्राणों की आहुति देकर देश की रक्षा की है। इसे भारतीय सेना का एक मजबूत अंग माना जाता है।

1758 में शुरू हुई थी योद्धाओं की वीर गाथा

15 सितम्बर 1941 को 11वीं और 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट को मिलाकर जमशेदपुर में बिहार रेजिमेंट की पहली बटालियन बनी। युद्ध का नारा-बजरंग बली की जय।’ आगरा में 1 दिसम्बर 1942 को बिहार रेजिमेंट की दूसरी बटालियन बनी। 1945 में आगरा में बिहार रेजिमेंटल सेंटर स्थापित किया गया। 2 मार्च 1949 को बिहार रेजिमेंटल सेंटर और प्रशिक्षण केंद्र को दानापुर मे स्थानांतरित किया गया। हालांकि, बिहार रेजिमेंट के योद्धाओं की वीरगाथा 1758 में ही शुरू हुई थी। अप्रैल 1758 में तीसरी बटालियन की पटना में स्थापना के बाद से बिहार के जवानों ने अपनी वीरता की कहानी लिखनी शुरू कर दी थी। कैप्टन टर्नर इस बटालियन की कमान संभालने वाले पहले अधिकारी थे। अंग्रेजों के कब्जे के बाद जून 1763 में मीर कासिम ने पटना पर हमला बोला।
बिहारी रेजिमेंट की तीसरी बटालियन के चंद सैनिकों ने मीर कासिम की विशाल सेना को पीछे धकेल दिया। अंग्रेजी सेना द्वारा मदद नहीं मिलने के चलते मीर कासिम की सेना विजयी रही। अंग्रेजों की तीन बटालियन समाप्त हो गयी। बंगाल, बिहार और ओडिशा पर पुनः राज्य स्थापित करने के लिए बिहारी सैनिकों को लेकर अंग्रेजों ने 6ठी, 8वीं और 9वीं बटालियन बनाई। इन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले की कई लड़ाइयों में अपनी वीरता का लोहा मनवाया।

बाबू कुंवर सिंह का साथ दिया

जुलाई 1857 में दानापुर स्थित 7वीं और 8वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल फूंकते हुए अंग्रेजों पर गोलियां बरसायीं। हथियार और ध्वज लेकर सैनिक जगदीशपुर चले आये और बाबू कुंवर सिंह के साथ शामिल हो गए। इन सैनिकों के साथ मिलकर बाबू कुंवर सिंह ने आरा पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों की सेना को शिकस्त दे आरा पर कब्जा कर लिया। इस हार से अंग्रेजी हुकूमत में खलबली मच गयी। हालांकि, युद्ध के दौरान लगी गोलियों के घाव से बाबू कुंवर सिंह की मृत्यु हो गयी। बिहारी सैनिकों के शौर्य से अंग्रेज इतने डर गए की 12 को छोड़ कर सभी यूनिटें भंग कर दी। 1941 तक अंग्रेज बिहारी सैनिकों को लेकर एक भी बटालियन बनाने की हिम्मत नहीं जुटा सके थे।

हाका और गैंगा द्वार के बारे में भी जानें

1944 में जापानी सेना के भारत के पूर्वी तट पर आक्रमण का सामना करने के लिए 1 बिहार रेजिमेंट को लुशाई ब्रिगेड में शामिल कर इम्फाल भेजा गया। सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए हाका और गैंगा पहाड़ियों को जापानी सैनिकों के कब्जे से मुक्त कराया। इसकी याद में दानापुर स्थित बिहार रेजिमेंटल सेंटर में हाका और गैंगा द्वार बना हुआ है। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में रेजीमेंट के सैनिकों ने वीरता दिखाई।
1999 में कारगिल युद्ध के दौरान बिहार रेजीमेंट की पहली बटालियन ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए अतिदुर्गम परिस्थितियों में बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के कब्जे से पोस्टों को मुक्त कराया। प्वाइंट 4268 और जुबेर ओपी पर पुनः कब्जा जमाया। युद्ध के दौरान प्रथम बिहार के एक अधिकारी और आठ जवान शहीद हुए। प्रथम बिहार को बैटल ऑनर बटालिक तथा थिएटर ऑनर कारगिल का सम्मान दिया गया।

बिहार रेजिमेंट को मिले पदक

मिलिट्री क्रॉस (स्वतंत्रता पूर्व) – 6, अशोक चक्र 3, महावीर चक्र – 2, कीर्ति चक्र – 13, वीर चक्र – 15, शौर्य चक्र – 45

जानिये इनकी शौर्यगाथा

कारगिल की लड़ाई में बिहार रेजिमेंट के करीब 10 हजार सैनिक शामिल हुए थे। 1971 की लड़ाई में जब पाक के दो टुकड़े हुए, उस लड़ाई में भी रेजिमेंट की अहम भूमिका थी।

मुंबई हमले में शहीद

2008 में मुंबई में हमला हुआ था तब एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन टोरनांडो में शहीद हो गए थे। मेजर संदीप बिहार रेजिमेंट के थे।

15 जांबाजों ने शहादत दी

घाटी के उरी सेक्टर में पाक से आए आतंकियों से लोहा लेते हुए रेजिमेंट के 15 जांबाजों ने प्राणों की आहुति दी थी।

1941 में गठन

बिहार रेजिमेंट का गठन आजादी के पूर्व 1941 में अंग्रेजों ने किया था। इसका गठन 11वीं (टेरिटोरियल) बटालियन और 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट को नियमित करके और नई बटालियनों का गठन करके किया गया था। यह भारतीय सेना की सबसे पुरानी पैदल सेना रेजिमेंट में से एक है।

दूसरा बड़ा कैंटोनमेंट

देश को जब-जब जरूरत पड़ी इस रेजिमेंट के जांबाज जवान वहां खड़े दिखे। रेजिमेंट का मुख्यालय बिहार की पटना के पास दानापुर में है। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा कैंटोनमेंट है।

23 बटालियन के साथ देश सेवा

वर्तमान में बिहार रेजिमेंट अपनी 23 बटालियन (4 राष्ट्रीय राइफल व दो टोरिटोरियल आर्मी बटालियन) के साथ देश की सेवा में लगा है।

खासियत

ऐसा कहा जाता है कि बिहार रेजिमेंट के जवान बहादुर होते हैं और वो किसी भी स्थिति में रह पाने के लायक होते हैं। इस वजह से दुर्गम और जटिल परिस्थितियों में इनको तैनात किया जाता है।

स्लोगन : कर्म ही धर्म है

कर्म ही धर्म है के स्लोगन के साथ बिहार रेजिमेंट के गठन का श्रेय भले ही अंग्रेजी हुकूमत को जाता है, लेकिन इसने देशभक्ति के जो उदाहरण पेश किए हैं, वे इतिहास में दर्ज हैं।

रेजिमेंट का वाक्य

जय बजरंगबली व बिरसा मुंडा की जय की हुंकार इस रेजीमेंट का वाक्य है। इस वाक्य को कहते हुए रेजिमेंट के जवान अपने में जोश भरते हैं और दुश्मन के दांत खट्टे कर देते हैं।

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